रायपुर। बोधगया स्थित विश्व प्रसिद्ध महाबोधी महाविहार को गैर-बौद्धों के नियंत्रण से मुक्त कराने और बोधगया मंदिर अधिनियम 1949 (बी.टी. एक्ट) को रद्द करने की मांग को लेकर भारतीय बौद्ध महासभा रायपुर (छत्तीसगढ़) ने जोरदार पहल करते हुए रायपुर जिला कलेक्टर के माध्यम से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा। महासभा ने मांग की कि महाबोधी महाविहार का पूर्ण प्रबंधन बौद्ध समाज को सौंपा जाए, ताकि इस पवित्र स्थल का संचालन बौद्ध परंपराओं और आस्था के अनुरूप हो सके।ज्ञापन में कहा गया है कि बोधगया का महाबोधी महाविहार विश्व के करोड़ों बौद्ध अनुयायियों की आस्था का केंद्र है, जहां भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। ऐसे ऐतिहासिक और पवित्र स्थल के प्रबंधन में बौद्ध समाज की निर्णायक भूमिका होना अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान व्यवस्था में लागू बोधगया मंदिर अधिनियम 1949 के कारण महाविहार के प्रबंधन में गैर-बौद्धों की भागीदारी बनी हुई है, जिसे बौद्ध समाज अपनी धार्मिक भावनाओं के विपरीत मानता है।भारतीय बौद्ध महासभा ने अपने ज्ञापन में स्पष्ट रूप से मांग की कि बी.टी. एक्ट 1949 को समाप्त कर महाबोधी महाविहार का संपूर्ण प्रबंधन बौद्ध समाज को सौंपा जाए। महासभा का कहना है कि यह केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि बौद्ध समाज के अधिकारों और सम्मान से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है।ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि पिछले एक वर्ष से पूरे भारत में बोधगया महाबोधी विहार मुक्ति को लेकर बौद्ध अनुयायियों द्वारा लगातार धरना-प्रदर्शन किया जा रहा है और यह आंदोलन आज 392वें दिन में प्रवेश कर चुका है। इसके बावजूद अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है, जिससे बौद्ध समाज में आक्रोश और निराशा बढ़ रही है।महासभा ने सरकार से अपील की कि बौद्धों के इस पवित्र स्थल को बौद्ध समाज के हाथों पूर्ण प्रबंधन अधिकार सौंपने के लिए शीघ्र और ठोस कदम उठाए जाएं। ज्ञापन में यह भी कहा गया कि यदि सरकार इस दिशा में सकारात्मक निर्णय लेती है तो देश और दुनिया भर के सभी बौद्ध अनुयायी इस सार्थक पहल के लिए सदैव आभारी रहेंगे।इस दौरान भारतीय बौद्ध महासभा के प्रदेश अध्यक्ष भोजराज गौरखेड़े, महासचिव बेनीराम गायकवाड़, ट्रस्टी अलका ताई बोरकर, जिला अध्यक्ष प्रकाश रामटेके, महासचिव विजय गजघाटे, कोषाध्यक्ष जी.एस. मेश्राम तथा समता सैनिक दल के दिलीप रागासे उपस्थित रहे।ज्ञापन सौंपते समय रायपुर शहर के विभिन्न वार्डों के बौद्ध एवं सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि भी बड़ी संख्या में मौजूद रहे और उन्होंने एकजुट होकर महाबोधी महाविहार को बौद्धों के अधिकार में सौंपने की मांग का समर्थन किया।